भारत में श्रमिकों के अधिकारों और उनकी आर्थिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। सरकार ने न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 को समाप्त कर "कोड ऑन वेजेस 2019" को लागू किया है, जो प्रत्येक श्रमिक को, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में काम करता हो, न्यूनतम मजदूरी का कानूनी अधिकार प्रदान करता है। इस परिवर्तन से असंगठित क्षेत्र के करोड़ों मजदूरों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय न्यूनतम आधार मजदूरी
इस नए कानून की एक विशेषता यह है कि केंद्र सरकार ने ₹178 प्रतिदिन की सलाहकारी दर पर एक "नेशनल फ्लोर वेज" या राष्ट्रीय न्यूनतम आधार मजदूरी निर्धारित की है। इसका अर्थ यह है कि कोई भी राज्य सरकार इस आधार दर से कम मजदूरी तय नहीं कर सकती। यह कदम श्रमिकों के लिए एक आर्थिक सुरक्षा जाल की तरह काम करेगा, क्योंकि इससे उनके न्यूनतम जीवनयापन की गारंटी मिलती है। इसके अलावा, नए कानून ने मजदूरी की परिभाषा में "50% नियम" को शामिल किया है, जिसके अनुसार मूल वेतन और महंगाई भत्ता कुल वेतन का कम से कम 50% होना चाहिए। यह प्रावधान नियोक्ताओं द्वारा भत्तों की आड़ में कम वेतन दिखाने की प्रथा को समाप्त करने में सहायक होगा।
असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को लाभ
नया कानून विशेष रूप से असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए फायदेमंद साबित होगा, जो अब तक कानूनी सुरक्षा से वंचित थे। पहले केवल "अनुसूचित रोजगार" के श्रमिकों को ही न्यूनतम मजदूरी का अधिकार था, लेकिन अब निर्माण कार्य, कृषि, फैक्ट्री, सेवा क्षेत्र और गिग व डिजिटल प्लेटफॉर्म वर्कर्स भी इस सुरक्षा दायरे में आएंगे। इसके अलावा, अकुशल से अत्यधिक कुशल तक चार श्रेणियों के लिए अलग-अलग मजदूरी दरें निर्धारित हैं। ये दरें प्रत्येक राज्य में उस क्षेत्र की जीवनयापन लागत के अनुसार तय होती हैं।
राज्यों में नई मजदूरी दरें
देशभर में अलग-अलग राज्यों ने अपने हिसाब से नई VDA (Variable Dearness Allowance) दरें अधिसूचित की हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली में मार्च 31, 2026 से नई दरें लागू होंगी जिसमें अकुशल श्रमिकों को ₹18,456 और कुशल श्रमिकों को ₹22,411 प्रतिमाह मिलेंगे। इसी तरह ओडिशा, गोवा, झारखंड और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने भी अपने-अपने राज्य की आर्थिक स्थिति और महंगाई के अनुसार मजदूरी दरें संशोधित की हैं। हर राज्य समय-समय पर इन दरों को अद्यतन करता रहता है इसलिए श्रमिकों को राज्य के श्रम विभाग की आधिकारिक अधिसूचनाएँ नियमित रूप से देखनी चाहिए।
नियोक्ताओं की जवाबदेही
इस कानून ने नियोक्ताओं की जवाबदेही को भी कड़ा बनाया है। अब निरीक्षण व्यवस्था में “इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर” मॉडल अपनाया गया है जो कंपनियों को नियम पालन में मदद करेंगे और उल्लंघन होने पर कार्रवाई करेंगे। हर माह वेतन भुगतान की अंतिम तारीख 7 तारीख तय की गई है तथा उल्लंघन पर भारी जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। साथ ही कर्मचारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी मार्ग अपना सकें।
Disclaimer: यह लेख सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी और सरकारी नीतियों के आधार पर लिखा गया है। न्यूनतम मजदूरी दरें राज्य, उद्योग और कौशल स्तर के अनुसार भिन्न हो सकती हैं। सटीक और अद्यतन जानकारी प्राप्त करने हेतु कृपया labour.gov.in या clc.gov.in पर जाएँ अथवा अपने राज्य के श्रम विभाग से संपर्क करें।








